आचार्य श्रीराम शर्मा जी
20 सितम्बर को जन्मदिवस पर विशेष : अध्यात्म के साथ समाज सुधार और मानव सेवा को बनाया जीवन का उद्देश्य
आगरा । गायत्री परिवार के संस्थापक एवं आध्यात्मिक चेतना के प्रमुख प्रवर्तक आचार्य श्रीराम शर्मा का जन्म 20 सितम्बर 1911 को उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के ग्राम आँवलखेड़ा में हुआ था। जमींदार परिवार में जन्म लेने के बावजूद उनका झुकाव बचपन से ही अध्यात्म, साधना और मानव सेवा की ओर था। उन्होंने अपने जीवन में अध्यात्म को केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं रखा, बल्कि समाज के कमजोर, वंचित और पीड़ित वर्गों की सेवा को भी जीवन का महत्वपूर्ण उद्देश्य बनाया।
बचपन से ही सेवा और संवेदना की भावना
आचार्य श्रीराम शर्मा के जीवन में सेवा भावना की शुरुआत बाल्यकाल से ही दिखाई देने लगी थी। बताया जाता है कि उनके गांव की एक हरिजन महिला कुष्ठ रोग से पीड़ित हो गई थी। उस समय समाज में कुष्ठ रोग को लेकर अनेक प्रकार की सामाजिक दूरी और भ्रांतियां थीं। बालक श्रीराम ने इन परिस्थितियों की परवाह किए बिना उस महिला की सेवा की। इसके लिए उन्हें अपने परिवार और समाज के विरोध का भी सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने सेवा का मार्ग नहीं छोड़ा। महिला के स्वस्थ होने के बाद उसने उन्हें आशीर्वाद दिया। यह घटना उनके जीवन में मानव सेवा की भावना को और मजबूत करने वाली बनी।
15 वर्ष की उम्र में मिली गायत्री साधना की दीक्षा
आचार्य श्रीराम शर्मा के जीवन में 15 वर्ष की आयु में एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक मोड़ आया। वसंत पंचमी के अवसर पर काशी में पंडित मदन मोहन मालवीय से उन्हें गायत्री की दीक्षा प्राप्त हुई। इसके बाद उनका जीवन साधना और आध्यात्मिक अनुशासन की दिशा में आगे बढ़ा। उनके जीवन-वृत्तांत के अनुसार इसी समय उन्हें अपनी गुरुसत्ता के दर्शन हुए और हिमालय जाकर गायत्री साधना करने का निर्देश प्राप्त हुआ। इस आदेश के बाद उन्होंने हिमालय में जाकर कठोर साधना और तप किया।
आध्यात्मिक साधना के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान
हिमालय से लौटने के बाद आचार्य श्रीराम शर्मा ने अपना जीवन समाजसेवा के साथ-साथ देश की स्वतंत्रता के संघर्ष को भी समर्पित किया। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया और नमक आंदोलन के दौरान सत्याग्रह के लिए आगरा पहुंचे। उनके जीवन से जुड़ी कथाओं के अनुसार इस दौरान पुलिस ने उनसे तिरंगा छीनने का प्रयास किया और उन्हें प्रताड़ित किया गया, लेकिन उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज को नहीं छोड़ा। बताया जाता है कि उन्होंने तिरंगे को अपने मुंह में दबा लिया और बेहोश होने के बाद ही उसके टुकड़े उनके मुंह से निकाले जा सके। इसी प्रसंग से उनके नाम के साथ ‘मत्त’ संबोधन जुड़ने की बात कही जाती है।
ऋषि अरविंद, रवीन्द्रनाथ टैगोर और महात्मा गांधी से मुलाकात
वर्ष 1935 के बाद आचार्य श्रीराम शर्मा के जीवन में एक नया चरण शुरू हुआ। उन्होंने आध्यात्मिक और राष्ट्रीय जीवन के प्रमुख व्यक्तित्वों से संपर्क किया। वे ऋषि अरविंद से मिलने पांडिचेरी पहुंचे। इसके बाद श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर से मिलने शांतिनिकेतन और महात्मा गांधी से मिलने सेवाग्राम भी गए। इन यात्राओं ने उनके चिंतन और कार्यक्षेत्र को व्यापक बनाया। इसके बाद उन्होंने जनजागरण और आध्यात्मिक चेतना के प्रसार के लिए ‘अखण्ड ज्योति’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। गायत्री परिवार से जुड़ी जानकारी के अनुसार यह पत्रिका आज भी विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित होती है।
गायत्री तपोभूमि और शांतिकुंज बने प्रमुख केंद्र
आचार्य श्रीराम शर्मा समय-समय पर हिमालय जाकर साधना और अनुष्ठान करते रहे। बाद में उन्होंने मथुरा स्थित गायत्री तपोभूमि तथा हरिद्वार स्थित शांतिकुंज को अपने विभिन्न आध्यात्मिक और सामाजिक कार्यों का प्रमुख केंद्र बनाया। शांतिकुंज से गायत्री परिवार के अनेक कार्यक्रमों और अभियानों का संचालन हुआ। यहां अखण्ड ज्योति का दीपक निरंतर प्रज्वलित रहने की परंपरा भी गायत्री परिवार की आध्यात्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सभी के लिए गायत्री साधना और यज्ञ का संदेश
आचार्य श्रीराम शर्मा का प्रमुख विचार था कि आध्यात्मिक ज्ञान, पठन-पाठन और यज्ञ जैसी गतिविधियों में समाज के सभी वर्गों की भागीदारी होनी चाहिए। इसी विचार के अनुरूप उन्होंने गायत्री साधना को व्यापक जनसमुदाय तक पहुंचाने का प्रयास किया। वर्ष 1958 में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर दस लाख लोगों को गायत्री की दीक्षा दिए जाने का उल्लेख उनके जीवन-वृत्तांत में मिलता है। इसमें विभिन्न वर्गों, वर्णों और आयु-समूहों के लोग शामिल हुए।
परिवार और नारी शक्ति को जोड़ा समाज निर्माण से
आचार्य श्रीराम शर्मा के कार्यक्रमों की एक विशेषता यह भी थी कि वे लोगों से सपरिवार शामिल होने का आग्रह करते थे। उनका मानना था कि सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत परिवार से होती है। उन्होंने महिलाओं को भी केवल घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित न रखते हुए उन्हें समाजसेवा, आध्यात्मिक जागरण और रचनात्मक कार्यों से जोड़ने पर जोर दिया। नारी शक्ति के जागरण को उन्होंने परिवार और समाज के सकारात्मक परिवर्तन का महत्वपूर्ण माध्यम माना।
वेद, उपनिषद और भारतीय ज्ञान परंपरा पर व्यापक लेखन
आचार्य श्रीराम शर्मा ने भारतीय आध्यात्मिक एवं दार्शनिक परंपरा के विभिन्न ग्रंथों पर व्यापक लेखन और व्याख्या की। उनके साहित्यिक कार्यों में वेद, पुराण, उपनिषद, स्मृति, आरण्यक, ब्राह्मण ग्रंथ, योगवाशिष्ठ, तंत्र तथा मंत्र महाविज्ञान सहित अनेक विषयों से संबंधित रचनाएं शामिल हैं। उनका साहित्य आध्यात्मिक साधना के साथ नैतिक जीवन, सामाजिक चेतना और आत्मनिर्माण पर भी जोर देता है।
‘युग निर्माण योजना’ के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन का प्रयास
आचार्य श्रीराम शर्मा के विचारों से ‘युग निर्माण योजना’ जैसे व्यापक सामाजिक-आध्यात्मिक कार्यक्रमों का विकास हुआ। इस अभियान का उद्देश्य समाज में व्याप्त अवैज्ञानिक और कालबाह्य रूढ़ियों के स्थान पर नई सामाजिक मान्यताओं और सकारात्मक जीवन मूल्यों को स्थापित करना बताया गया। यज्ञ, संस्कार, नैतिक जागरण, परिवार निर्माण और सामाजिक सेवा जैसे कार्यों के माध्यम से लोगों को रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ने का प्रयास किया गया।
साधना के दौरान धर्मपत्नी भगवती देवी ने संभाला कार्यभार
आचार्य श्रीराम शर्मा जब साधना और हिमालय प्रवास के लिए जाते थे, तब उनके अनेक कार्यों की जिम्मेदारी उनकी धर्मपत्नी श्रीमती भगवती देवी ने संभाली। उन्होंने भी गायत्री परिवार के विस्तार और सामाजिक-आध्यात्मिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दोनों के संयुक्त प्रयासों से गायत्री परिवार की गतिविधियों को व्यापक स्वरूप मिला।
2 जून 1990 को परमसत्ता में विलीन हुए
आचार्य श्रीराम शर्मा का निधन 2 जून 1990 को गायत्री जयंती के अवसर पर हुआ। गायत्री परिवार की परंपरा में इस दिन को उनके जीवन की पूर्णाहुति और परमसत्ता में विलय के रूप में स्मरण किया जाता है। उनके द्वारा स्थापित विचार, साहित्य, साधना परंपरा और सामाजिक जागरण से जुड़े कार्यक्रम आज भी उनके अनुयायियों के बीच जारी हैं।
आज भी प्रेरणा का स्रोत है आचार्य श्रीराम शर्मा का जीवन
आचार्य श्रीराम शर्मा का जीवन अध्यात्म, साधना, स्वाध्याय, समाजसेवा और राष्ट्र निर्माण के विचारों के समन्वय के रूप में देखा जाता है। उनके जन्मदिवस पर गायत्री परिवार और उनके अनुयायी उनके विचारों को स्मरण करते हुए मानव सेवा, आत्मनिर्माण और सामाजिक जागरण के कार्यों को आगे बढ़ाने का संकल्प लेते हैं।
जय गुरुदेव। जय गायत्री मां।