चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में ऑनलाइन व्याख्यान किया गया
मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के विधि अध्ययन संस्थान के समन्वयक डॉ. विवेक कुमार त्यागी ने रूस की प्रतिष्ठित कुटाफिन मॉस्को स्टेट लॉ यूनिवर्सिटी में आयोजित 7वीं समर स्कूल ऑफ फॉरेन लॉ में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए महत्वपूर्ण व्याख्यान दिया। उन्होंने “Commercialization of Innovation: From Dharma to Market — Dharmic and Mimamsa Perspectives” विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए, जिसे विभिन्न देशों के शिक्षाविदों, शोधार्थियों और विधि विशेषज्ञों ने गंभीरता से सुना।
इस अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में रूस, भारत, चीन, ब्राज़ील, इक्वाडोर, पेरू, तंजानिया तथा कांगो गणराज्य सहित अनेक देशों के प्रतिभागियों ने भाग लिया। डॉ. त्यागी ने अपने व्याख्यान में नवाचार और बौद्धिक संपदा के व्यावसायीकरण को लेकर एक वैकल्पिक भारतीय दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, जो पश्चिमी मॉडल से अलग सामाजिक उत्तरदायित्व, सार्वजनिक हित और नैतिक दायित्वों पर आधारित है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में अनुसंधान और नवाचार को मुख्य रूप से व्यापारिक लाभ तथा बाजारीकरण के अधिकार के संदर्भ में देखा जाता है, जबकि भारतीय दर्शन, धर्म और मीमांसा परंपरा नवाचार को व्यापक सामाजिक हित, लोककल्याण और वैश्विक जिम्मेदारी के साथ जोड़कर देखती है। डॉ. त्यागी ने तर्क दिया कि जिन अनुसंधानों और नवाचारों को सार्वजनिक संसाधनों या सरकारी सहायता से विकसित किया जाता है, उन पर प्रथम अधिकार समाज और जनता का होना चाहिए। साथ ही उनसे प्राप्त लाभ को पुनः सार्वजनिक हित के कार्यों में लगाया जाना चाहिए।
अपने व्याख्यान के दौरान उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण माने जाने वाले नगोया प्रोटोकॉल का भी उल्लेख किया और स्थानीय ज्ञान, जैविक संसाधनों तथा लाभों के न्यायसंगत वितरण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि विकासशील देशों के पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय संसाधनों को वैश्विक नवाचार प्रणाली में उचित सम्मान और संरक्षण मिलना चाहिए।
डॉ. त्यागी ने यह भी प्रतिपादित किया कि वैश्विक बौद्धिक संपदा समझौतों, तकनीक हस्तांतरण और अंतरराष्ट्रीय संविदाओं की व्याख्या केवल शब्दों के आधार पर नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने भारतीय मीमांसा और पूर्व मीमांसा की व्याख्यात्मक पद्धति को आधुनिक विधिक विवादों और अनुबंधों के समाधान का प्रभावी माध्यम बताया। उनके अनुसार किसी भी संविदा या विधिक प्रावधान की व्याख्या उसके उद्देश्य, सामाजिक संदर्भ और सार्वजनिक उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए की जानी चाहिए।
व्याख्यान में उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नवाचार का व्यावसायीकरण केवल लाभ अर्जित करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह सामाजिक हित, न्यायपूर्ण वितरण और सार्वजनिक उत्तरदायित्व से जुड़ी एक महत्वपूर्ण विधिक प्रक्रिया भी है। उन्होंने कहा कि बौद्धिक संपदा अधिकारों को केवल निजी स्वामित्व के रूप में नहीं, बल्कि सार्वजनिक निवेश और सामाजिक दायित्वों के संदर्भ में भी समझा जाना चाहिए।
प्रस्तुति के दौरान भारत, रूस और ब्रिक्स देशों की नवाचार नीतियों एवं ढांचों का तुलनात्मक विश्लेषण भी प्रस्तुत किया गया। इसमें प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, लाइसेंसिंग, मूल्य निर्धारण, समान अवसर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, पारंपरिक ज्ञान संरक्षण और जलवायु प्रौद्योगिकी जैसे उभरते क्षेत्रों में विधिक शासन की चुनौतियों और संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की गई।
डॉ. त्यागी ने भारत की राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा नीति और ब्रिक्स देशों की नवाचार पहलों का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसी नीतियां आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक कल्याण को भी सुनिश्चित कर सकती हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भविष्य की नवाचार नीतियों में लाभ के साथ नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व का संतुलन आवश्यक है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित इस कार्यक्रम में ओ.ई. कुटाफिन मॉस्को स्टेट लॉ यूनिवर्सिटी के रेक्टर प्रोफेसर बलेझिव विक्टर व्लादिमीरोविच, वाइस रेक्टर प्रोफेसर व्लादिमीर निकोलोविच सिनयोकोव, स्कूल प्रमुख प्रोफेसर मारिया एलेक्सजन्डरोवा, यूरोपियन लॉ विभाग के प्रमुख प्रोफेसर सरगे यूरीविच कासकिन तथा प्रतिष्ठित विधि विशेषज्ञ ऐलन डफलोट सहित अनेक विद्वान उपस्थित रहे।
डॉ. विवेक कुमार त्यागी का यह व्याख्यान अंतरराष्ट्रीय विधि जगत में भारतीय विधिक चिंतन, मीमांसा दर्शन और नवाचार कानून के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रस्तुति वैश्विक स्तर पर बौद्धिक संपदा, नवाचार कानून और ज्ञान के न्यायसंगत वितरण को लेकर चल रही बहस को नई दिशा प्रदान करेगी।